आँखों की समस्या क्यों इतनी तेज़ी से बढ़ रही है

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एक थकी हुई मानव आंख का क्लोज़-अप जिसमें स्क्रीन टाइम और ब्लू लाइट की वजह से दिखाई देने वाला strain दिख रहा है,
लंबे स्क्रीन टाइम और ब्लू लाइट से बढ़ती आँखों की समस्याओं को दर्शाती एक यथार्थवादी आंख की तस्वीर।

आज की आधुनिक जीवनशैली में आँखों की समस्या इतनी तेजी से बढ़ रही है कि हर दूसरा व्यक्ति चश्मा पहने दिखाई देता है। पहले आँखों की रोशनी कम होना या नंबर का चश्मा लगाना बड़ी उम्र की समस्या मानी जाती थी, लेकिन अब 8–10 साल के छोटे बच्चों को भी चश्मा लग रहा है। युवाओं में तो हालत यह है कि मोबाइल, लैपटॉप और टीवी के बीच उनकी आँखें आराम ही नहीं कर पातीं। यह बदलाव अचानक नहीं हुआ, बल्कि पिछले कुछ सालों में डिजिटल लाइफस्टाइल इतनी ज़्यादा बढ़ गई है कि आँखों पर इसका गहरा असर दिखाई दे रहा है। स्क्रीन पर लगातार घंटों तक देखने से आँखों पर स्ट्रेन बढ़ता है, ब्लू लाइट रेटिना को धीरे-धीरे नुकसान पहुँचाती है और पलकें कम झपकने से dryness बढ़ जाती है। कई लोग जानते ही नहीं कि उनकी आँखें धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही हैं क्योंकि यह problem अचानक नहीं होती, बल्कि धीरे-धीरे eyesight कम करती है।

लोगों की आँखें खराब होने के पीछे सबसे बड़ा कारण लगातार बढ़ता स्क्रीन टाइम है। आज हर इंसान औसतन 7 से 10 घंटे तक मोबाइल, टैबलेट या लैपटॉप देखता है और यह नंबर बच्चों में भी कम नहीं है। पढ़ाई ऑनलाइन, काम ऑनलाइन, मनोरंजन ऑनलाइन—सबकुछ स्क्रीन पर आ चुका है। लगातार स्क्रीन देखने से आँखों की muscles पर बहुत दबाव पड़ता है, और यही दबाव धीरे-धीरे eyesight को कमजोर कर देता है। मोबाइल को नज़दीक से देखने की आदत ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। मोबाइल जितना पास होता है, आँखों को उतना ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और यही वजह है कि नज़दीक का नंबर (myopia) तेज़ी से बढ़ रहा है। आज “स्क्रीन टाइम” मानव शरीर के लिए उतना ही खतरनाक बन चुका है जितना कई साल पहले smoking कहा जाता था।

इसके अलावा ब्लू लाइट एक बड़ी समस्या बन चुकी है। मोबाइल, लैपटॉप और टीवी सभी ब्लू लाइट छोड़ते हैं, जो आंखों की कोशिकाओं को धीरे-धीरे कमजोर करती है। यह ब्लू लाइट नींद भी खराब करती है, रेटिना को नुकसान पहुँचाती है और आँखों में लगातार जलन और सूखापन बनाए रखती है। यही कारण है कि नींद पूरी न होने से भी आँखों पर असर पड़ता है। आजकल लोग रात 1–2 बजे तक मोबाइल देखते रहते हैं, जिससे आँखों को पूरा आराम नहीं मिलता और धीरे-धीरे रोशनी कम होने लगती है। नींद पूरी न होने से आँखों में heaviness, light sensitivity, सूजन और redness आम बात बन चुकी है।

खानपान की खराब आदतें भी आँखों के खराब होने का बड़ा कारण हैं। विटामिन A, ओमेगा-3 फैटी एसिड, lutein और zeaxanthin जैसे पोषक तत्व आँखों के लिए बेहद जरूरी हैं, लेकिन आज की फास्ट-फूड वाली लाइफस्टाइल में ये चीजें बहुत कम लोग लेते हैं। पोषण की कमी से रेटिना कमजोर होती है, dryness बढ़ती है और रात में देखने की क्षमता कम होती जाती है। बच्चों में भी जंक फूड की आदत बढ़ने से आँखों की समस्या जल्दी शुरू हो रही है। इसके साथ ही तनाव (Stress) भी eyesight को तेजी से प्रभावित करता है। तनाव से शरीर का blood flow कम होता है, blink rate घट जाता है और आँखों की muscles हमेशा tight हो जाती हैं। मानसिक तनाव सीधे आँखों को नुकसान पहुँचाता है, लेकिन बहुत से लोग इसे समझ नहीं पाते।

दूसरी ओर, प्रदूषण, धूल, धूप, और लंबे समय तक AC में बैठने से भी आँखों पर असर पड़ रहा है। आजकल Dry Eyes इतनी आम हो चुकी है कि हर दूसरे व्यक्ति को दिन में कई बार जलन या चुभन महसूस होती है। AC कई घंटों तक चलने से कमरे की हवा सूख जाती है, और आँखों में नमी खत्म होने लगती है। इसलिए dryness, redness, irritation और पानी आने की शिकायत हर उम्र में दिख रही है। लम्बे समय तक मोबाइल को अंधेरे में देखने से आँखों की मांसपेशियाँ और ज्यादा थक जाती हैं और यह आदत eyesight को तेज़ी से खराब करती है। लेटकर मोबाइल देखने से आँखों पर और ज्यादा दबाव पड़ता है, पर लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं।

जिन लोगों का काम लगातार कंप्यूटर पर होता है, उनमें Computer Vision Syndrome तेजी से बढ़ रहा है। यह समस्या सिरदर्द, भारीपन, धुंधला दिखाई देना, गर्दन में दर्द और आँखों पर लगातार दबाव के रूप में दिखाई देती है। लोग समझते हैं कि यह माइग्रेन है या कमजोरी, लेकिन असल में यह स्क्रीन का असर होता है। इससे आँखों का पावर तेजी से बढ़ सकता है। बच्चे भी इसी समस्या से गुजर रहे हैं। पढ़ाई, गेम्स, वीडियो—सब मोबाइल पर होने से बच्चों में myopia खतरनाक स्तर पर पहुँच चुका है। पहले बच्चों में नंबर धीरे-धीरे बढ़ता था, लेकिन अब 6 महीनों में ही पावर तेजी से ऊपर बढ़ जाता है।

एक बड़ी गलतफहमी यह है कि चश्मा लगाने से नंबर रुक जाता है। जबकि चश्मा सिर्फ vision को clear करता है, नंबर बढ़ने से नहीं रोकता। नंबर तब रुकता है जब lifestyle बदली जाए। यानी स्क्रीन टाइम कम हो, आँखों को आराम मिले, posture सही हो, outdoor activities बढ़े और पोषण शरीर को सही मिले। यह बात आंखों के डॉक्टर भी बार-बार कहते हैं कि बच्चों को रोज कम से कम 1 घंटे धूप में खेलने देना चाहिए ताकि आँखों की muscles को natural relaxation मिले।

समस्या केवल eyesight तक सीमित नहीं है। आज dark circles भी एक बड़ी समस्या बन चुके हैं। लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आँखों के नीचे की nerves पर दबाव पड़ता है, रक्त संचार कम होता है और dark circles बन जाते हैं। इसके साथ-साथ floaters, redness, सूखी आँखें, double vision, light sensitivity और बार-बार पानी आने जैसी समस्याएँ लगातार बढ़ रही हैं। ये सभी संकेत हैं कि आँखें थक चुकी हैं और उन्हें आराम की आवश्यकता है।

अगर आप आँखों को बचाना चाहते हैं, तो कुछ जरूरी आदतें अपनाना बहुत जरूरी है। जैसे हर 20 मिनट में 20 फीट दूर देखकर 20 सेकंड का ब्रेक लेना, जिसे 20-20-20 rule कहते हैं। मोबाइल को आंखों से बहुत पास न रखें और लेटकर कभी न देखें। कमरे की लाइट जलाकर मोबाइल का उपयोग करना चाहिए और ब्लू लाइट फिल्टर ऑन रखना चाहिए। भोजन में हरी सब्जियाँ, गाजर, पालक, बादाम, अखरोट, मछली और पीले-नारंगी फल लेना eyesight को मजबूत करता है। नींद पूरी होना सबसे जरूरी है और रोजाना कम से कम 7–8 घंटे की नींद आँखों को तेजी से recover करती है।

आखिर में बात यही है कि आज आँखें खराब नहीं हो रहीं—हम अपनी आँखों को खुद खराब कर रहे हैं। स्क्रीन का उपयोग गलत तरीके से, देर रात तक मोबाइल, गलत खानपान, कम नींद और तनाव ने आँखों की रोशनी छीनना शुरू कर दिया है। अगर समय रहते आदतें बदल ली जाएँ, तो eyesight को बहुत हद तक बचाया जा सकता है। आँखें हमारे शरीर का सबसे कीमती हिस्सा हैं, और इन्हें स्वस्थ रखना हमारी जिम्मेदारी है।

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