कैंसर आज के समय की सबसे तेजी से बढ़ती हुई बीमारियों में से एक बन चुका है। जहाँ पहले यह दुर्लभ माना जाता था, वहीं अब लगभग हर घर-परिवार में कोई न कोई इस बीमारी से प्रभावित मिल जाता है। लोगों के मन में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आखिर कैंसर इतना आम क्यों हो चुका है और यह इतना खतरनाक क्यों माना जाता है। इसकी वजह सिर्फ एक नहीं, बल्कि कई परतों में छिपी हुई हैं—हमारी जीवनशैली, पर्यावरण, खान-पान, बढ़ती उम्र, तनाव और आनुवांशिकी सभी मिलकर इस बीमारी को फैलाने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
आधुनिक जीवनशैली ने हमारी सेहत पर गहरा प्रभाव डाला है। पहले लोग प्राकृतिक भोजन खाते थे, शारीरिक श्रम अधिक था और प्रदूषण कम था। लेकिन आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में प्रोसेस्ड फूड, जंक फूड, अत्यधिक शुगर और तले हुए पदार्थों का सेवन बढ़ गया है। इन खाद्य पदार्थों में मौजूद केमिकल एडिटिव्स और प्रिज़रवेटिव्स शरीर में धीरे-धीरे सूजन पैदा करते हैं और कोशिकाओं की सामान्य क्रियाओं को बाधित करते हैं। इसके साथ ही बैठकर काम करने की आदत, व्यायाम की कमी और मोटापा कई तरह के कैंसर का बड़ा कारण बन चुके हैं। धूम्रपान और शराब का सेवन भी लंबे समय में कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाते हैं और कैंसर की संभावनाएं कई गुना बढ़ा देते हैं।
पर्यावरण प्रदूषण भी एक बड़ा कारण है। हवा में मौजूद जहरीले धुएँ, माइक्रोपार्टीकल्स, कॉस्मेटिक्स के अनचाहे केमिकल्स, पेस्टिसाइड्स, प्लास्टिक से मिलने वाले टॉक्सिन्स—ये सब शरीर में ऐसे बदलाव लाते हैं जो धीरे-धीरे कैंसर का रूप ले सकते हैं। यह सबसे खतरनाक इसलिए है क्योंकि इसका प्रभाव तुरंत दिखता नहीं, बल्कि सालों बाद गंभीर रूप में सामने आता है। रेडिएशन एक्सपोज़र, दूषित पानी और रसायनों से भरे खाद्य पदार्थ दैनिक जीवन में लगातार हमारे शरीर को प्रभावित करते रहते हैं।
इसका एक और कारण यह भी है कि अब कैंसर का पता लगाना पहले की तुलना में आसान हो गया है। मेडिकल साइंस की प्रगति ने स्क्रिनिंग और टेस्टिंग को इतना बेहतर कर दिया है कि अब वे कैंसर भी पकड़ लिए जाते हैं जो पहले अनदेखे रह जाते थे। इसका मतलब यह नहीं कि कैंसर पहले नहीं था—बल्कि कई मामले सामने ही नहीं आते थे। पर इसके बावजूद असल मामलों में भी बढ़ोतरी हो रही है, जिसका कारण हमारी तेज़ गति वाली आधुनिक जीवनशैली और पर्यावरण दोनों हैं।
बढ़ती उम्र भी एक महत्वपूर्ण कारण है। पहले औसत उम्र कम होती थी, लेकिन आज लोग लंबा जी रहे हैं। उम्र बढ़ने के साथ हमारे शरीर की कोशिकाएं बार-बार विभाजित होती हैं और समय के साथ इनमें गलतियाँ यानी म्यूटेशन जमा हो जाती हैं। यह म्यूटेशन बाद में कैंसर का कारण बन सकता है। इसलिए जैसे-जैसे दुनिया की उम्रदराज़ आबादी बढ़ रही है, कैंसर के मामलों में भी इज़ाफ़ा स्वाभाविक हो गया है।
आनुवांशिकता भी कैंसर को बढ़ावा दे सकती है। कुछ लोगों में ऐसे जीन मौजूद होते हैं जिससे उनमें कुछ कैंसर का जोखिम अधिक होता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि परिवार में बीमारी होने पर आपको ज़रूर कैंसर होगा। यह सिर्फ जोखिम को बढ़ाता है। असल में जीन और पर्यावरण मिलकर बीमारी के लिए रास्ता बनाते हैं—यानी बीज जीन का हो सकता है, लेकिन मिट्टी और मौसम हमारी जीवनशैली और आदतें तय करती हैं।
कैंसर खतरनाक इसलिए माना जाता है क्योंकि यह चुपचाप बढ़ता है और जब तक इसके लक्षण साफ दिखाई देने लगते हैं, तब तक यह शरीर के कई हिस्सों में फैल चुका होता है। यह सामान्य कोशिकाओं की तरह नियंत्रित नहीं होता, बल्कि तेजी से बढ़ता है और शरीर के अंगों की कार्य क्षमता को धीरे-धीरे खत्म करता जाता है। यदि यह समय पर पकड़ा न जाए तो अंग विफलता तक की स्थिति आ सकती है—इसीलिए कैंसर का डर लोगों के मन में सबसे ज्यादा बैठता है।
बचाव की बात करें तो सच यह है कि कैंसर पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसका जोखिम ज़रूर कम किया जा सकता है। स्वस्थ खान-पान, नियमित व्यायाम, धूम्रपान छोड़ना, शराब सीमित करना, तनाव कम करना और समय-समय पर आवश्यक स्क्रिनिंग करवाना बेहद असरदार कदम हैं। इसके साथ HPV और हेपेटाइटिस-B जैसी वैक्सीन भी उन कैंसरों से बचाव देती हैं जो वायरल संक्रमण से उत्पन्न होते हैं।
कैंसर का इलाज भी लगातार बेहतर हो रहा है। पहले जहाँ सिर्फ सर्जरी या रेडिएशन ही विकल्प थे, वहीं अब इम्यूनोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी और प्रेसिशन मेडिसिन जैसी आधुनिक तकनीकें ऐसे कैंसर को भी रोक रही हैं जिन्हें पहले असाध्य माना जाता था। हालांकि ये उपचार महंगे हो सकते हैं और हर मरीज के लिए समान रूप से उपयोगी नहीं होते, लेकिन वे धीरे-धीरे कैंसर को नियंत्रण में रखने का भविष्य बना रहे हैं।
आखिर में, कैंसर डर से नहीं बल्कि जानकारी, जागरूकता और समय पर कार्रवाई से कम होता है। जितनी जल्दी इसका पता चलता है, उतनी ही जल्दी इलाज प्रभावी होने लगता है। लोगों को यह समझने की जरूरत है कि कैंसर का नाम भय पैदा करता है, लेकिन जागरूकता जीवन बचाती है। यही ज्ञान जब ब्लॉग, सोशल मीडिया और बातचीत के माध्यम से फैलता है, तो यह सिर्फ एक लेख नहीं रहता—बल्कि कई जिंदगियाँ बचाने वाला संदेश बन जाता है।

