आख़िर कैसे हमारी हवा इतनी जहरीली हो गई? जानें AQI किस तरह हमारे फेफड़ों को धीरे-धीरे खत्म कर देता है

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A man wearing an N95 mask standing on a heavily polluted road in India with dense smog and traffic in the background, highlighting dangerous AQI and toxic air conditions.
भारत की जहरीली हवा—AQI के बढ़ते स्तर और स्मॉग की मार से जूझता शहर

भारत में सर्दी का मौसम आते ही हवा की गुणवत्ता तेजी से बिगड़ जाती है। लोग सुबह उठते ही मौसम देखने से पहले AQI चेक करते हैं और अक्सर स्क्रीन पर 300, 400 या कभी-कभी उससे भी अधिक की खतरनाक संख्या चमकती दिखाई देती है। AQI यानी Air Quality Index यह बताता है कि हम जिस हवा को साँस के रूप में अंदर ले रहे हैं, वह कितनी साफ है या कितनी जहरीली। आज भारत के कई शहरों में AQI लगातार “बहुत खराब” या “गंभीर” ज़ोन में बना रहता है, जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर बहुत बड़े और सीधे प्रभाव पड़ते हैं। हवा में मौजूद छोटे कण, खासकर PM2.5 और PM10, इतने खतरनाक होते हैं कि आँख से दिखाई भी नहीं देते, लेकिन शरीर में घुसकर गंभीर समस्याएँ खड़ी कर देते हैं।

जब AQI बढ़ता है, तो सबसे पहले इसका असर हमारे फेफड़ों पर पड़ता है। सांस लेने में दिक्कत, लगातार खाँसी, गले में खराश, घरघराहट और सीने में जकड़न जैसी समस्याएँ आम हो जाती हैं। अस्थमा के मरीजों के लिए तो यह किसी खतरे की घंटी की तरह है—हल्का सा प्रदूषण बढ़ते ही उनका सांस फूलने लगता है। PM2.5 के बेहद छोटे कण फेफड़ों में जाकर सूजन पैदा करते हैं और लंबे समय तक ऐसे माहौल में रहने से फेफड़ों की क्षमता घटती चली जाती है। कई लोग जिन्हें सांस की दिक्कत कभी नहीं थी, वे भी अचानक एलर्जिक खाँसी और अस्थमा जैसे लक्षण महसूस करने लगते हैं।

खराब हवा सिर्फ फेफड़ों को नहीं, बल्कि दिल को भी प्रभावित करती है। प्रदूषित हवा में मौजूद कण खून में जाकर धमनियों में सूजन बढ़ाते हैं, जिससे हृदय की धड़कनों में अनियमितता, ब्लड प्रेशर बढ़ने और हार्ट अटैक तक का जोखिम बढ़ जाता है। भारत में पहले से ही दिल की बीमारियों के मामले बढ़ रहे हैं, और ऐसे में खराब AQI हालात को और बदतर बना देता है। कई रिपोर्टों में यह पाया गया है कि जिस दिन AQI बहुत खराब होता है, उन दिनों अस्पतालों में हार्ट और सांस से जुड़ी समस्याओं के मरीजों की संख्या अचानक बढ़ जाती है।

आँखों में जलन, लालपन, खुजली और पानी आना भी प्रदूषण के आम दुष्प्रभाव हैं। हवा में मौजूद धूल और केमिकल्स आँखों की नाज़ुक परतों पर हमला करते हैं, जिससे सूजन और असहजता बढ़ जाती है। साथ ही त्वचा पर खुजली, एलर्जी, रैशेज़ और रूखापन भी यही कारणों से बढ़ता है। कई लोगों को लगता है कि उन्हें किसी चीज़ से एलर्जी हो रही है, लेकिन असल में इसकी वजह जहरीली हवा होती है।

कम लोग जानते हैं कि प्रदूषण दिमाग पर भी असर डालता है। जब हवा में प्रदूषण बढ़ता है, तो व्यक्ति अक्सर चिड़चिड़ा महसूस करता है, सिर दर्द बढ़ जाता है, एकाग्रता कम हो जाती है और थकान ज्यादा लगने लगती है। PM2.5 जैसे कण खून के जरिए दिमाग तक पहुँचकर न्यूरॉन्स को प्रभावित कर सकते हैं। कई शोध बताते हैं कि लंबे समय तक खराब हवा में रहने से मानसिक तनाव, माइग्रेन और यहां तक कि डिप्रेशन का खतरा भी बढ़ सकता है।

बच्चों के लिए तो प्रदूषण किसी धीमे ज़हर जैसा है। उनके फेफड़े अभी विकसित हो रहे होते हैं, और जब वे जहरीली हवा में सांस लेते हैं, तो विकास रुक जाता है। उन्हें बार-बार सर्दी-जुकाम, खाँसी, एलर्जी और अस्थमा जैसी समस्याएँ घेर लेती हैं। स्कूल जाते समय, पार्क में खेलते समय और खुले वातावरण में दौड़ते समय बच्चे सबसे ज्यादा प्रदूषण के संपर्क में आते हैं। यही कारण है कि सर्दियों में स्कूलों को बंद करने की नौबत भी कई बार आ जाती है।

गर्भवती महिलाओं पर भी इसका गहरा असर पड़ता है। खराब AQI के कारण गर्भ में पल रहे बच्चे तक ऑक्सीजन पहुँचने की क्षमता घट सकती है, जिससे लो वेट बेबी, समय से पहले डिलीवरी और कमजोर इम्यूनिटी जैसी समस्याएँ देखने को मिलती हैं। जो महिलाएँ लगातार प्रदूषण में रहती हैं, उन्हें सांस और दिल से जुड़ी दिक्कतें भी अधिक सताती हैं।

लंबे समय तक अगर कोई व्यक्ति जहरीली हवा में रहने को मजबूर हो, तो इसके दुष्परिणाम और भी गंभीर हो सकते हैं। फेफड़ों का कैंसर, हार्ट डिज़ीज़, स्ट्रोक, डायबिटीज़ और कई तरह की क्रॉनिक बीमारियाँ लगातार प्रदूषण के संपर्क में रहने से पैदा हो सकती हैं। WHO के अनुसार वायु प्रदूषण एक “साइलेंट किलर” है—जो धीरे-धीरे शरीर को कमजोर करता रहता है और कई साल बाद इसका असर दिखता है।

लेकिन सवाल यह भी है कि भारत में AQI इतना खराब क्यों हो जाता है? इसके पीछे कई कारण हैं—वाहनों का बढ़ता धुआं, पराली जलाना, फैक्ट्रियों का उत्सर्जन, निर्माण कार्यों की धूल, सर्दियों में हवा का स्थिर हो जाना, बढ़ती आबादी, यहां तक कि दिवाली के बाद पटाखों का धुआं भी हालात को और बिगाड़ देता है। जब हवा ठंडी होती है तो प्रदूषण ऊपर उठ नहीं पाता और जमीन के पास ही जमा हो जाता है, जिससे AQI “सीवियर” स्तर तक पहुँच जाता है।

खुद को बचाने के लिए कुछ सावधानियाँ बेहद जरूरी हैं। बाहर निकलते समय N95 या N99 मास्क पहनना, घर में एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करना, पौधों को घर में लगाना, विंडो सिर्फ साफ समय पर खोलना, विटामिन-C और पानी ज्यादा लेना जैसी आदतें बड़ी मदद कर सकती हैं। बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को खासतौर पर खराब AQI वाले दिनों में बाहर कम ही जाना चाहिए।

अंत में यही कहा जा सकता है कि बढ़ता AQI सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि हमारे स्वास्थ्य के लिए खतरे की लाल चेतावनी है। भारत में प्रदूषण की समस्या हर साल बढ़ रही है और जब तक व्यापक स्तर पर कदम नहीं उठाए जाते, तब तक हमें ही अपने स्वास्थ्य की जिम्मेदारी लेनी होगी। साफ हवा किसी एक शहर या परिवार का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे देश का अधिकार है। जब हम साफ हवा को प्राथमिकता देंगे, तभी आने वाली पीढ़ियाँ स्वस्थ भारत का सपना देख पाएंगी।

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