क्या आपने कभी सोचा है कि जब कॉफी की एक बूंद टेबल पर गिरकर सूखती है, तो उसके किनारों पर एक गहरी गोल रिंग बन जाती है?
जी हाँ,यही अब ‘कॉफी स्टेन इफेक्ट’ कहलाता है।
लेकिन अब सोचिए — अगर यही साधारण-सा असर खाने में मिलाए गए ज़हरीले केमिकल्स को पहचानने का तरीका बन जाए, तो? यही कमाल कर दिखाया है बेंगलुरु स्थित रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट (RRI) के वैज्ञानिकों ने।
बेंगलुरु के रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट (RRI) के वैज्ञानिकों ने इसी साधारण से असर का उपयोग करते हुए एक ऐसा अनोखा तरीका खोज निकाला है, जिससे खाने में मिलाए जाने वाले खतरनाक सिंथेटिक डाई (जैसे Rhodamine B) को बेहद सूक्ष्म मात्रा में भी आसानी से पहचाना जा सकता है।
यह खोज न केवल खाद्य सुरक्षा (Food Safety) के लिए अहम है, बल्कि पर्यावरण प्रदूषण रोकने में भी बहुत मददगार साबित हो सकती है।

( Rhodamine B ) क्यों है खतरनाक?
वैज्ञानिकों की टीम ने इस तकनीक की मदद से Rhodamine B नामक एक सिंथेटिक फ्लोरोसेंट डाई को पहचानने का तरीका खोज निकाला है।
यह डाई आम तौर पर टेक्सटाइल और कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स में इस्तेमाल की जाती है लेकिन कुछ लोग इसे ग़ैरकानूनी रूप से खाने की चीज़ों में मिलाते हैं, ताकि रंग और चमक ज्यादा दिखे यह त्वचा और आंखों को नुकसान पहुंचाता है इसकी वजह से सांस की तकलीफें हो बनती है यह पर्यावरण में लंबे समय तक बना रहता है, खासकर पानी में घुलकर, जिससे प्रदूषण फैलता है।
कैसे काम करता है कॉफी स्टेन इफेक्ट
जब कॉफी या किसी भी तरल में ठोस कण से घुले होते हैं और वो बूंद सूखती है, तो ये कण किनारों की ओर चले जाते हैं और वहां जम जाते हैं। इससे बनती है एक गोल रिंग यानी कॉफी स्टेन RRI के वैज्ञानिकों ने इसी प्रक्रिया का इस्तेमाल किया लेकिन कॉफी के बजाय पानी में गोल्ड नैनोरॉड्स मिलाए गोल्ड नैनोरॉड्स छोटे-छोटे सोने के छड़ जैसे कण होते हैं, जिनकी लंबाई सिर्फ कुछ नैनोमीटर (एक मीटर का अरबवां हिस्सा) होती है
उन्होंने इस घोल को एक साफ़ सिलिकॉन सतह पर डाला और उसे सूखने दिया। जैसे-जैसे पानी सूखा, नैनोरॉड्स किनारे पर जाकर जम गए और एक चमकदार गोल रिंग बना ली अगर इस रिंग में Rhodamine B जैसी डाई मौजूद हो, तो जब उस पर लेज़र किरण डाली जाती है, तो वो काफी तेज़ ऑप्टिकल सिग्नल देती है। यही सिग्नल बताता है कि डाई मौजूद है और कितनी मात्रा में है।
जबरदस्त सटीकता / So Accurate It Detects Poison
शुरुआत में इस तकनीक से सिर्फ तब तक डिटेक्शन संभव था जब डाई की मात्रा ज्यादा हो यानी लगभग एक गिलास पानी में एक बूंद डाई लेकिन जैसे-जैसे वैज्ञानिकों ने नैनोरॉड्स की मात्रा बढ़ाई, उनकी डिटेक्शन क्षमता लाखों गुना बढ़ गई अब यह तकनीक एक ट्रिलियन (10¹²) में से एक हिस्से तक Rhodamine B को पहचान सकती है यानी पार्ट्स पर ट्रिलियन (ppt) स्तर की संवेदनशीलता इतनी सटीकता आज की किसी भी पारंपरिक मशीन से कहीं ज़्यादा है।
भविष्य की खोज
सबसे खास बात यह है कि यह तकनीक बहुत सस्ती और आसान है।
जहां महंगे उपकरणों से जांच करने में घंटों का समय लग जाता है, वहीं इस कॉफी स्टेन तकनीक के ज़रिए सिर्फ कुछ ही मिनटों में बेहद सूक्ष्म मात्रा में मौजूद डाई या जहरीले रसायनों का पता लगाया जा सकता है। इस खोज से न केवल खाद्य सुरक्षा (Food Safety) को मजबूती मिलेगी, बल्कि पानी और पर्यावरण में प्रदूषण की जांच भी अब पहले से कहीं अधिक आसान हो जाएगी। भविष्य में इसी तकनीक की मदद से दवाओं, पानी या मिट्टी में छिपे खतरनाक केमिकल्स का भी पता लगाया जा सकेगा।
निष्कर्ष Conclusion
रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों की यह खोज यह साबित करती है कि प्रकृति की छोटी-छोटी घटनाओं में भी बड़ी वैज्ञानिक संभावनाएं छिपी होती हैं।

