आजकल हर जगह प्लास्टिक बोतलें दिखती हैं — पानी, जूस, सेनेटाइज़र, शैंपू, और सैकड़ों चीज़ें। ये सुविधाजनक और सस्ती हैं, मगर इनमें छिपा जोखिम इतना छोटा नहीं जितना दिखता है बोतलें कैसे हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं, किस तरह के रसायन हैं जिनसे हमें खतरा है, और हम खुद क्या कर सकते हैं प्लास्टिक हल्का, सस्ता और टूटता नहीं — इसलिए आज के जमाने में यह एक सामान्य विकल्प बन गया। लेकिन प्लास्टिक में इस्तेमाल होने वाले रसायन अक्सर स्थायी नहीं होते और समय के साथ बोतल के अंदर के तरल में मिल सकते हैं। इसे ‘लीचिंग’ (leaching) कहते हैं — यानी प्लास्टिक के अणु धीरे-धीरे अलग होकर पानी या पेय में घुल जाते हैं।
कौन-कौन से हानिकारक पदार्थ मिलते हैं?
प्लास्टिक में कई प्रकार के कैमिकल होते हैं, पर कुछ खास रूप से चिंतनीय हैं:
- बिस्फेनॉल A (BPA): यह हॉर्मोनल सिस्टम को प्रभावित करता है और इसे ‘एन्डोक्राइन डिसरप्टर’ कहते हैं। छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं में इसका असर ज्यादा खतरनाक हो सकता है।
- फ्थैलेट्स (Phthalates): इन्हें प्लास्टिक को लचकदार बनाने के लिए मिलाया जाता है। ये भी हार्मोन को प्रभावित कर सकते हैं और प्रजनन क्षमता पर असर डाल सकते हैं।
- पॉलीकार्बोनेट और पॉलीस्टिरिन से निकलने वाले सॉल्वेंट/मोनोमर्स: गरम होने पर या समय के साथ इनसे भी लीचिंग हो सकती है।
- माइक्रोप्लास्टिक्स: प्लास्टिक छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटकर पानी और खाद्य पदार्थों में घूमते रहते हैं। इन्हें निगलना मुश्किल है और इनके स्वास्थ्य प्रभावों पर शोध जारी है।
कैसे होता है शरीर पर असर?
ये रसायन सीधे तौर पर हमारे शरीर की सहनशीलता और जैविक प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप कर सकते हैं:
- हार्मोन असंतुलन: BPA और फ्थैलेट्स शरीर के हार्मोन जैसे एस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरोन की तरह व्यवहार कर सकते हैं या उनकी गतिविधि बदल सकते हैं। इससे मासिक चक्र, प्रजनन क्षमता और विकास पर असर हो सकता है।
- विकासात्मक समस्याएँ: गर्भावस्था में माँ को इनसे बचना जरूरी है — क्योंकि भ्रूण का विकास प्रभावित हो सकता है, जिससे जन्मजात असामान्यताएँ या विकास में देरी हो सकती है।
- जबड़े और चयापचय संबंधी बीमारियाँ: कुछ अध्ययनों ने प्लास्टिक से जुड़े रसायनों को मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग से जोड़ा है — हो सकता है ये रसायन शरीर की चयापचय प्रक्रियाओं को प्रभावित करते हों।
- कैंसर का जोखिम: कुछ प्लास्टिक के घटकों को संभावित कैंसरजनक माना गया है; हालाँकि साक्ष्य मिश्रित हैं और शोध जारी है।
- गट (आंत) और इम्यून सिस्टम पर प्रभाव: माइक्रोप्लास्टिक्स और रसायन आंत में सूजन और माइक्रोबायोम में बदलाव ला सकते हैं, जो लंबी अवधि में स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा कर सकते हैं।
कौन-सा प्लास्टिक अधिक खतरनाक है?
सब प्लास्टिक समान नहीं होते। री-यूज़ (पुन:प्रयोग) और हीटिंग का प्रभाव भी अलग-अलग प्रकार के प्लास्टिक में अलग होता है। रिप्रोडक्टिव और हार्मोनल रिस्क वाले प्लास्टिक अक्सर पॉलीकार्बोनेट (प्राछीन कड़े प्लास्टिक) या कुछ प्रकार के रेज़िन से आते हैं। प्लास्टिक पर अक्सर री-साइक्लिंग कोड होते हैं — 1 से 7 तक नंबर — जिनसे पता चलता है किस प्रकार का प्लास्टिक है। उदाहरण के लिए:
- कोड 7 में ‘अन्य’ होते हैं — इसमें पॉलीकार्बोनेट और BPA वाले प्रोडक्ट आ सकते हैं।
- कोड 3 (PVC) और 6 (Polystyrene) भी कुछ मामलों में चिंतनीय माने जाते हैं।
लेकिन ध्यान रखें: सिर्फ नंबर देखकर पूरी सुरक्षा की गारंटी नहीं लगाई जा सकती — उपयोग और रखरखाव भी मायने रखता है।
प्रयोग और रख-रखाव किस तरह जोखिम बढ़ाते हैं?
- गरम करना: प्लास्टिक को माइक्रोवेव में गर्म करने या धूप में छोड़ देने से लीचिंग तेज़ होती है। गर्मी प्लास्टिक के अणुओं को ढीला कर देती है, जिससे वे तरल में घुल जाते हैं।
- पुरानी या खरोंच वाली बोतलें: बार-बार यूज़ करने से सतह पर छोटे-छोटे क्रैक और स्क्रेच बनते हैं — जिससे माइक्रोप्लास्टिक और रसायन निकलने की सम्भावना बढ़ती है।
- कठोर रसायनों से सफाई: कुछ क्लीनर या सोड़े के घोल प्लास्टिक को कमजोर कर देते हैं, जिससे लीचिंग बढ़ सकती है।
पर्यावरण पर प्रभाव
प्लास्टिक सिर्फ इंसान को ही नहीं मारता — यह पर्यावरण का भी दुश्मन है।
- समुद्रों में प्लास्टिक: हजारों टन प्लास्टिक नदियों और समुद्रों में पहुँचते हैं, जिससे समुद्री जीवन प्रभावित होता है। मछलियाँ, कच्ची शैवाल और स्तनधारी प्लास्टिक निगल लेते हैं — और वे रसायन खाद्य श्रृंखला में ऊपर उठते हैं।
- माइक्रोप्लास्टिक्स का फैलाव: ये मिट्टी, हवा, खाने-पीने की वस्तुओं में पहुँच चुके हैं — हमारे भोजन के हर स्तर पर।
- रेसाइक्लिंग की कमी: बहुत सा प्लास्टिक ठीक से रीसायकल नहीं होता और लैंडफिल में जाता है, जहाँ से भी रसायन रिसते रहते हैं।
- इंसीनेरेशन (जलाना): प्लास्टिक जलाने से टॉक्सिक गैसें निकल सकती हैं, जो हवाई प्रदूषण और स्वास्थ्य दोनों के लिए खतरनाक हैं।
रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जोखिम कहाँ मिलते हैं?
- पैक किए गए पानी की बोतलें, खासकर जब वे बार-बार उपयोग की जा रही हों।
- फ्रीजर और माइक्रोवेव में प्लास्टिक कंटेनर का इस्तेमाल।
- गर्म गाड़ियाँ — धूप में छड़ी हुई प्लास्टिक बोतलें।
- डाइट सोडा या किसी केमिकल युक्त पेय के प्लास्टिक बोतलें।
क्या बोतलबंद पानी पूरी तरह खतरनाक है?
नहीं— हर बोतलबंद पानी ख़तरनाक नहीं होता। कई बॉटलें सुरक्षित मानी जाती हैं और कंपनियाँ BPA-free लेबल देती हैं। पर समस्या तब आती है जब बोतल पुरानी हो, बार-बार उपयोग हो, या बोतल को गर्म किया जाए। साथ ही माइक्रोप्लास्टिक्स का सवाल तब भी बना रहता है क्योंकि कुछ शोध बताते हैं कि बोतलबंद पानी में माइक्रोप्लास्टिक मौजूद हो सकते हैं।
क्या सरकारें और कंपनियाँ सुरक्षा पर काम कर रही हैं?
दुनिया के कई देशों में BPA और कुछ फ्थैलेट्स पर प्रतिबंध लगे हैं, खासकर बेबी बोतलों और बच्चों के खिलौनों में। कंपनियाँ भी “BPA-free” लेबल देती हैं। पर यह समझना ज़रूरी है कि BPA-free का मतलब हमेशा सुरक्षित नहीं—कई बार BPA की जगह दूसरे समान रसायन का इस्तेमाल होता है जिनका प्रभाव पूरी तरह समझा नहीं गया हो।
सुरक्षित विकल्प और प्रैक्टिकल टिप्स
- कांच या स्टेनलेस स्टील की बोतलें अपनाएँ: ये लंबे समय तक सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प हैं।
- प्लास्टिक गरम न करें: माइक्रोवेव या स्टोव पर प्लास्टिक कंटेनर न रखें।
- धूप में प्लास्टिक न रखें: गाड़ी की सीट पर या खुले में प्लास्टिक बोतलें छोड़ना नुकसानदेह हो सकता है।
- पुरानी या खरोंचदार बोतलें बदलें: रीयूज़ के नाम पर बार-बार वही पतली बोतल इस्तेमाल न करें।
- रीसाइक्लिंग और अपसायक्लिंग: जहाँ संभव हो, प्लास्टिक को अलग रखें और वैध रीसायक्लिंग केंद्रों को दें।
- लेबल पढ़ें: BPA-free या रिसायक्लिंग कोड देखकर समझदारी से चुनें।
- कम पैकेज्ड उत्पाद चुनें: बड़े पैमाने पर नहीं, लोकल और ढक्कन वाले कंटेनर चुनें।
व्यक्तिगत और समाजिक जिम्मेवारी
हमारे छोटे-छोटे फैसले बड़े बदलाव ला सकते हैं। व्यक्तिगत तौर पर सुरक्षित विकल्प चुनकर और प्लास्टिक का उपभोग कम करके हम न केवल अपनी सेहत बचाते हैं, बल्कि समुद्रों और धरती को भी बचाते हैं। सरकारों और कंपनियों को भी जिम्मेदारी उठानी होगी — बेहतर रेगुलेशन, पारदर्शिता और टिकाऊ विकल्प प्रदान करके।
निष्कर्ष
प्लास्टिक बोतलें हर दिन mili-gram स्तर पर रसायन छोड़ सकती हैं — जो सालों के साथ स्वास्थ्य पर असर डालते हैं। यह डराने वाला तो है, पर निराश करने वाला नहीं। सही जानकारी, समझदार विकल्प और रोज़मर्रा की आदतों में छोटे बदलाव से हम इस खतरे को काफी हद तक कम कर सकते हैं।

